Paper Title

रामचरितमानस के चौपाई-दोहा छंदों की लयात्मकता और उनके गायन-परंपरा का तुलनात्मक अध्ययन

Authors

पूजा शुक्ला , डॉ नागेश कुमार त्रिपाठी

Keywords

रामचरितमानस,तुलसीदास,चौपाई छंद,दोहा छंद,छंद-विधान,लयात्मकता,मात्रा-रचना,तुलसीदास,चौपाई छंद,दोहा छंद,छंद-विधान,लयात्मकता,मात्रा-रचना

Abstract

यह शोध-पत्र यह शोध-पत्र यह शोध-पत्र रामचररतमानस में प्रयुक्त दो प्रमुख छंदों—चौपाई और दोहा—की लयात्मकता तथा उनसे विकससत हुई विविध गायन-परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। तुलसीदास ने मानस की रचना केिल काव्यात्मक सौंदयय के सलए नह ं की, बल्कक उन्होंने छंदों को इस प्रकार विन्यस्त ककया कक िे पाठ, िाचन, और गायन—तीनों में समान रूप से प्रभािी बने रहें। यह कारण है कक चौपाई की ल्स्थर, समान गतत िाल लय तथा दोहा की उतार-चढाियुक्त भािपूणय लय सददयों से भारतीय संगीत-परंपरा और कथा-िाचन परंपरा का असभन्न अंग बनी हुई है। अध्ययन के प्रथम भाग में छंद-विधान, मात्रा-रचना, विराम-प्रयोग तथा आंतररक लय (Internal Rhythm) का विश्लेषण ककया गया है। चौपाई में 16-16 मात्राओं की संतुसलत संरचना इसे सरस, प्रिाहयुक्त और कथा-प्रिाह के सलए उपयुक्त बनाती है। िह ं दोहा में विषम-सम मात्रा-संयोजन भाि-स्थापन, करुणा, भल्क्त तथा मनोभािनाओं की तीव्र असभव्यल्क्त के सलए अधधक उपयुक्त ससद्ध होता है। द्वितीय भाग में गायन-परंपराओं—जैसे व्यास-परंपरा, मानस-गायन मंडसलयााँ, अखण्ड-पाठ तथा क्षेत्रीय लोक-धुनों—का तुलनात्मक अिलोकन प्रस्तुत ककया गया है। पाया गया कक चौपाई प्रायः “सम-लय” में गाई जाती है, जबकक दोहा “डोल-लय” या “लहरदार-उच्चारण” के साथ गहरे भािों को असभव्यक्त करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कक रामचररतमानस के छंद केिल सादहल्त्यक विन्यास नह ं, बल्कक गेय-परंपरा के मूलाधार हैं। इनके बबना कथा-िाचन, लोक-गायन और मानस-कीतयन की परंपराएाँ न केिल अधूर , बल्कक असंभि सी प्रतीत होतीं। इस प्रकार यह शोध भारतीय काव्य-परंपरा में छंद-लय और संगीत-परंपरा के परस्पर संबंध को प्रामाणणक रूप से रेखांककत करता है। मुख्य शब्द :रामचररतमानस,तुलसीदास,चौपाई छंद,दोहा छंद,छंद-विधान,लयात्मकता,मात्रा-रचना में प्रयुक्त दो प्रमुख छंदों—चौपाई और दोहा—की लयात्मकता तथा उनसे विकससत हुई विविध गायन-परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। तुलसीदास ने मानस की रचना केिल काव्यात्मक सौंदयय के सलए नह ं की, बल्कक उन्होंने छंदों को इस प्रकार विन्यस्त ककया कक िे पाठ, िाचन, और गायन—तीनों में समान रूप से प्रभािी बने रहें। यह कारण है कक चौपाई की ल्स्थर, समान गतत िाल लय तथा दोहा की उतार-चढाियुक्त भािपूणय लय सददयों से भारतीय संगीत-परंपरा और कथा-िाचन परंपरा का असभन्न अंग बनी हुई है। अध्ययन के प्रथम भाग में छंद-विधान, मात्रा-रचना, विराम-प्रयोग तथा आंतररक लय (Internal Rhythm) का विश्लेषण ककया गया है। चौपाई में 16-16 मात्राओं की संतुसलत संरचना इसे सरस, प्रिाहयुक्त और कथा-प्रिाह के सलए उपयुक्त बनाती है। िह ं दोहा में विषम-सम मात्रा-संयोजन भाि-स्थापन, करुणा, भल्क्त तथा मनोभािनाओं की तीव्र असभव्यल्क्त के सलए अधधक उपयुक्त ससद्ध होता है। द्वितीय भाग में गायन-परंपराओं—जैसे व्यास-परंपरा, मानस-गायन मंडसलयााँ, अखण्ड-पाठ तथा क्षेत्रीय लोक-धुनों—का तुलनात्मक अिलोकन प्रस्तुत ककया गया है। पाया गया कक चौपाई प्रायः “सम-लय” में गाई जाती है, जबकक दोहा “डोल-लय” या “लहरदार-उच्चारण” के साथ गहरे भािों को असभव्यक्त करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कक रामचररतमानस के छंद केिल सादहल्त्यक विन्यास नह ं, बल्कक गेय-परंपरा के मूलाधार हैं। इनके बबना कथा-िाचन, लोक-गायन और मानस-कीतयन की परंपराएाँ न केिल अधूर , बल्कक असंभि सी प्रतीत होतीं। इस प्रकार यह शोध भारतीय काव्य-परंपरा में छंद-लय और संगीत-परंपरा के परस्पर संबंध को प्रामाणणक रूप से रेखांककत करता है। मुख्य शब्द :रामचररतमानस,तुलसीदास,चौपाई छंद,दोहा छंद,छंद-विधान,लयात्मकता,मात्रा-रचना में प्रयुक्त दो प्रमुख छंदों—चौपाई और दोहा—की लयात्मकता तथा उनसे विकससत हुई विविध गायन-परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। तुलसीदास ने मानस की रचना केिल काव्यात्मक सौंदयय के सलए नह ं की, बल्कक उन्होंने छंदों को इस प्रकार विन्यस्त ककया कक िे पाठ, िाचन, और गायन—तीनों में समान रूप से प्रभािी बने रहें। यह कारण है कक चौपाई की ल्स्थर, समान गतत िाल लय तथा दोहा की उतार-चढाियुक्त भािपूणय लय सददयों से भारतीय संगीत-परंपरा और कथा-िाचन परंपरा का असभन्न अंग बनी हुई है। अध्ययन के प्रथम भाग में छंद-विधान, मात्रा-रचना, विराम-प्रयोग तथा आंतररक लय (Internal Rhythm) का विश्लेषण ककया गया है। चौपाई में 16-16 मात्राओं की संतुसलत संरचना इसे सरस, प्रिाहयुक्त और कथा-प्रिाह के सलए उपयुक्त बनाती है। िह ं दोहा में विषम-सम मात्रा-संयोजन भाि-स्थापन, करुणा, भल्क्त तथा मनोभािनाओं की तीव्र असभव्यल्क्त के सलए अधधक उपयुक्त ससद्ध होता है। द्वितीय भाग में गायन-परंपराओं—जैसे व्यास-परंपरा, मानस-गायन मंडसलयााँ, अखण्ड-पाठ तथा क्षेत्रीय लोक-धुनों—का तुलनात्मक अिलोकन प्रस्तुत ककया गया है। पाया गया कक चौपाई प्रायः “सम-लय” में गाई जाती है, जबकक दोहा “डोल-लय” या “लहरदार-उच्चारण” के साथ गहरे भािों को असभव्यक्त करता है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कक रामचररतमानस के छंद केिल सादहल्त्यक विन्यास नह ं, बल्कक गेय-परंपरा के मूलाधार हैं। इनके बबना कथा-िाचन, लोक-गायन और मानस-कीतयन की परंपराएाँ न केिल अधूर , बल्कक असंभि सी प्रतीत होतीं। इस प्रकार यह शोध भारतीय काव्य-परंपरा में छंद-लय और संगीत-परंपरा के परस्पर संबंध को प्रामाणणक रूप से रेखांककत करता है। मुख्य शब्द :रामचररतमानस,तुलसीदास,चौपाई छंद,दोहा छंद,छंद-विधान,लयात्मकता,मात्रा-रचना

How To Cite

"रामचरितमानस के चौपाई-दोहा छंदों की लयात्मकता और उनके गायन-परंपरा का तुलनात्मक अध्ययन", IJSDR - International Journal of Scientific Development and Research (www.IJSDR.org), ISSN:2455-2631, Vol.11, Issue 3, page no.a630-a644, March-2026, Available :https://ijsdr.org/papers/IJSDR2603077.pdf

Issue

Volume 11 Issue 3, March-2026

Pages : a630-a644

Other Publication Details

Paper Reg. ID: IJSDR_306905

Published Paper Id: IJSDR2603077

Downloads: 000227

Research Area: Arts All

Country: REWA, MADHYA PRADESH, India

Published Paper PDF: https://ijsdr.org/papers/IJSDR2603077

Published Paper URL: https://ijsdr.org/viewpaperforall?paper=IJSDR2603077

About Publisher

ISSN: 2455-2631 | IMPACT FACTOR: 9.15 Calculated By Google Scholar | ESTD YEAR: 2016

An International Scholarly Open Access Journal, Peer-Reviewed, Refereed Journal Impact Factor 9.15 Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool, Multidisciplinary, Monthly, Multilanguage Journal Indexing in All Major Database & Metadata, Citation Generator

Publisher: IJSDR(IJ Publication) Janvi Wave

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